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स्वप्न ही है कल्पना भविष्य की

यूँ ही मैं कविता बनाता, स्वप्न जो देखता वह बुलबुला होता फूट जाता वह बह जाता या, नीर में ll कौमुदी यूँ ही मुस्कुराने लगी और कहने लगी, व्यर्थ हैँ कोशिशें तुम्हारी अनन्त में तैरते हो जो पंख नहीं होते आदमी के ll हँस के मैं बोला गिरता और उठता हूँ मैं पर कोशिश नहीं बुलबुले हैँ मेरी लड़खड़ाता और लड़खड़ाता हूँ पर हसरतें नहीं हैँ पानी स्वप्न ही है कल्पना भविष्य की चूम लूँगा एक दिन आकाश को भी मैं ll